January 22, 2026

CG : कहानी मजबूरों की, जो कोई कह नहीं रहा सब दिख रहा है, मनरेगा का काम शुरू नहीं, रोजी-रोटी की तलाश में दूसरे प्रदेश जा रहे लोग

PALAYAN00

रायपुर। चलो, उठो, घर छोड़ो…कहीं ओर चलें। वहीं रहेंगे, काम करेंगे… रुपए कमाएंगे। पेट भरेंगे, जब त्योहार आएगा…गांव लौट आएंगे। यही कहानी है मजबूरों की। सूबे के कई इलाकों की। खासकर सुदूर ग्रामीण आदिवासी क्षेत्रों की। कहानी कोई कह नहीं रहा। सब-कुछ सबको दिख रहा है। बस अड्डों पर…रेलवे स्टेशनों पर। परिवार के परिवार सवार होकर जा रहे हैं। अनजान शहर में…काम की तलाश में, दाम की चाह में। यह सब पलायन कहलाता है। पलायन जिंदगियों का। पलायन मिट्टी से…पलायन घरों से, पलायन पढ़ाई से…पलायन खुद से। पलायन रिश्तों से… नातों से..पलायन यादों से। आखिर क्यों होता है, पलायन। जब हमारी जमीं पर काम नहीं, तो होता है पलायन।

छत्तीसगढ़ के कई जिलों से इन दिनों बड़े पैमाने पर रोजी रोटी के लिए मजदूरों के पलायन की खबर हैं। ग्रामीण मजदूरों को सरकारी श्रम मूलक काम नहीं मिलने के कारण वे लगातार देश के बड़े शहरों में रोजगार की तलाश में पलायन कर रहे हैं। स्थिति ऐसी है कि प्रतिदिन रेलवे स्टेशन और बस स्टेण्ड से 500 से ज्यादा की संख्या में लोग रोजगार के लिए दूसरे प्रदेश जा रहे हैं। प्रतिदिन १०० से ज्यादा संख्या में मजदूर बेमेतरा जिला मुख्यालय से महाराष्ट्र की ओर जाने वाले यात्री बसों से ये लोग पुणे शहर के लिए रवाना हो रहे है। इसके अलावा कई लोग रायपुर से ट्रेन के माध्यम से दिल्ली, हैदराबाद, लखनऊ, जम्मू समेत अन्य बड़े शहर जा रहे है।

बताया जा रहा हैं कि ये चार-पांच माह से लगातार रोजगार की तलाश में भटक रहे हैं। वहीं ग्राम पंचायतों में इनके लिए पर्याप्त काम नहीं होने के कारण मजबूरी में रोजी-रोटी के तलाश में परिवार समेत रवाना हो रहे हैं। मनरेगा से भी मजदूरों को बारहमासी काम नहीं मिल पा रहा है। ग्राम पंचायत चुनाव को संपन्न हुए करीब 9 माह का समय बीत गया। अब तक ग्राम पंचायतों में रोजगार मूलक कार्य स्वीकृत नहीं हो पाया। पंचायतों को सरकार से मिलने वाला अनुदान राशि बीते साल भर से नहीं मिलने से कई काम बंद पड़े हुए हैं। चार माह की कृषि कार्य के बाद मजदूरों के पास जीवन यापन के लिए कोई रोजगार उपलब्ध नहीं हो पा रहा है। मनरेगा के तहत ग्राम पंचायत में स्थाई रूप से मजदूरों को रोजगार उपलब्ध कराने कार्य स्वीकृत किए जाते हैं, जो बंद पड़े हुए हैं।

मजदूरों की जगह कृषि यंत्रों का उपयोग हो रहा आमतौर पर कृषि कार्य मजदूरों के भरोसे होते रहा है। लेकिन नई-नई पद्धति और कृत्रिम कृषि का काम अब मजदूर के बदले सीधे मशीन से करने लगे हैं। धान बोनी से लेकर थरहा लगाने और धान कटाई का काम हार्वेस्टर के माध्यम से होने के बाद से अधिकांश काम मशीन से हो रहा। इससे मजदूर अब रोजगार के लिए दूसरे शहरों पर आश्रित हो गए हैं। बेमेतरा के 50 से अधिक गांव के लोग तीन-चार माह पूर्व ही रोजगार की तलाश में देश के बड़े शहरों में पलायन कर गए। दीपावली के बाद से एक बार फिर मजदूरों के पलायन में काफी तेजी आ गई है। अकेले बेमेतरा बस स्टैंड से 6 से 7 यात्री बस लगातार महाराष्ट्र की ओर सवारी ढो रहे हैं।

अब तक नहीं मिली 15वें वित्त आयोग की राशि : पंचायत चुनाव हुए करीब 9 महीने का समय बीत गया। अभी तक बेमेतरा जिले के किसी भी ग्राम पंचायत को 15 वे वित्त आयोग की राशि नहीं मिल पाई है। नवनिर्वाचित सरपंच सरकारी कामकाज के अलावा बुनियादी सुविधाओं को लेकर भी कोई नया काम अब तक नहीं कर पाए। सरपंच अशोक साहू ने बताया कि शासन से ग्राम पंचायत चुनाव होने के बाद अनुदान राशि नहीं मिली और ना ही 15वें वित्त आयोग की राशि पंचायत खाते में आई है। जिसके कारण पानी, बिजली, स्वच्छता, मरम्मत कार्य, नाली सफाई और अन्य आवश्यक कार्य बंद पड़े हुए हैं। मजदूरों को रोजगार उपलब्ध कराने काम स्वीकृत नहीं हो पा रहा है।

बड़े शहरों में पलायन करने वाले मजदूरों का कहना है कि मनरेगा के तहत एक डेढ़ महीने तक ही लगातार काम मिलता है। इसके बाद फिर मजदूरी की समस्या बनी ही रहती है। इसलिए मजदूर बारहमासी रोजगार के तलाश में दूसरे प्रदेश के बड़े शहरों में पलायन कर जाते हैं। जहां पर परिवार समेत दिहाड़ी मजदूरी के अलावा कारपेंटर मिस्त्री, वेल्डिंग मैकेनिक वाहन चालक इत्यादि अन्य काम पर्याप्त मजदूरी दर पर बड़े शहर में मिल जाता है। इसलिए दूसरे प्रदेश के शहरों में जीवन यापन करने के लिए पलायन करते हैं।

पलायन के दृश्य पीड़ादायक हैं। अफसोस यह है कि जिन हुक्मरानों को इस पीड़ा की परवाह करना चाहिए, वे बेफिक्र हैं। सबसे पहला दायित्व यह है कि हुक्मरान पलायन क्षेत्रों में जाएं और वहां के हालात को समझें। काम क्यों नहीं है? रोजगार के कौन से अवसर पैदा किए जा सकते हैं? मजबूर लोगों को काम के लिए सैकड़ों मील दूर क्यों जाना पड़ रहा है? क्या प्रदेश के ही विकसित शहरी व ग्रामीण इलाकों में इन्हें ले जाया जा सकता है? क्या पलायन को थामना वाकई में बेहद मुश्किल काम है? यह प्रश्न ज्यादा कठिन नहीं हैं, मगर कोई जवाब देना ही नहीं चाहे तब तो मानव समाज की इस विभीषिका से पार पाना असंभव ही है !

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