January 22, 2026

CG : अतिशेष स्‍कूलों के समायोजन आदेश के बाद सरकार का एक और बड़ा निर्णय, नहीं देंगे राशि

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रायपुर। छत्तीसगढ़ सरकार शिक्षकों के विरोध और अनिश्चितकालीन हड़ताल (School Rationalization Controversy) के बावजूद समायोजन नीति से पीछे हटने को फिलहाल तैयार नहीं है। हाल ही में शिक्षकों की काउंसलिंग और स्कूलों की सूची जारी करने के बाद अब सरकार ने एक और बड़ा और कड़ा कदम उठाया है।

जिन 10,463 स्कूलों का समायोजन किया गया है, उनके वित्तीय अधिकार तत्काल प्रभाव से रोक दिए गए हैं। इसका सीधा असर स्कूलों के खर्च और कार्यप्रणाली पर पड़ेगा। उनका खर्च शैक्षणिक सत्र 2025-26 से बंद कर दिया जाएगा। इस आदेश के बाद से स्‍कूल प्रबंधकों और अतिशेष शिक्षकों में हड़कंप मच गया है। इन स्‍कूलों की बची हुई राशि को भी सरकार को वापस करना पड़ेगा।

स्‍कूलों को जारी किया आदेश
समग्र शिक्षा अभियान की ओर से सभी जिला शिक्षा अधिकारी (School Rationalization Controversy) सह पदेन जिला परियोजना अधिकारी को निर्देशित किया गया है कि समायोजन वाले स्कूलों को किसी भी प्रकार का अनुदान व्यय न करने दिया जाए।

समायोजन ऐसे स्‍कूलों का किया गया है, जिनमें बच्‍चों की संख्‍या न के बराबर है। अब उन स्‍कूलों को सरकार की ओर से खर्च भी नहीं दिया जाएगा। सत्र 2025-26 में जारी अनुदान की राशि 29 मई 2025 के बाद से जारी नहीं की जाएगी। इसी के साथ ही पूरा खर्च भी रोक दिया गया है। अब कोई स्‍कूल खर्च करता है तो कार्रवाई होगी। साथ ही इन स्‍कूलों से बची हुई राशि वापस ली जाएगी। पूरी कार्रवाई की जानकारी राज्य कार्यालय को तत्काल भेजी जाए।

शिक्षकों का बढ़ता विरोध, पर सरकार अडिंग
इस निर्णय के बाद शिक्षकों में आक्रोश और बढ़ना तय है। समायोजन (School Rationalization Controversy) के विरोध में पहले ही राज्य भर के शिक्षक संगठनों ने आंदोलन और अनिश्चितकालीन हड़ताल की घोषणा कर रखी है। संगठनों का कहना है कि इस नीति से शिक्षकों का मनोबल टूट रहा है। परिवारों को समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है। स्कूलों की गुणवत्ता पर असर पड़ेगा। इन सब समस्‍याओं के गिनाने के बाद भी सरकार इस नीति पर मजबूती से डटी हुई दिखाई दे रही है।

क्या है युक्तियुक्तकरण (समायोजन) नीति?
समायोजन का मकसद स्‍कूल-शिक्षकों और संसाधनों का समान और तर्कसंगत वितरण करना है, ताकि जिन स्कूलों में शिक्षक अधिक हैं, वहां से उन्हें जरूरत वाले स्कूलों में भेजा जा सके। सरकार का तर्क है कि इससे शैक्षणिक गुणवत्ता और संसाधन प्रबंधन बेहतर होगा।

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