January 22, 2026

ना छत बची, ना दीवार, बर्बादी बोने वाले अब खुद तबाही के शिकार… हिड़मा के गांव में सुकून, कुछ कदम दूर आज भी खौफ

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जगदलपुर। बस्तर में सड़कों के निर्माण से नक्सल प्रभावित गांवों में विकास और खुशहाली आई है, जबकि सड़क संपर्क से वंचित क्षेत्रों में भय और असुरक्षा का माहौल बना हुआ है। सड़क बनने से पूवर्ती गांव में खुशहाली आई है, वहीं सड़क न होने से देवा के इलाके में खौफ है। यह अंतर बस्तर में देखने को मिलता है, जहां सड़कें उम्मीद, बदलाव और आत्मविश्वास लाती हैं।

जहां सड़कें नहीं वहां फैला है डर
बस्तर में सड़कें सिर्फ विकास नहीं हैं, बल्कि उम्मीद, बदलाव, आत्मविश्वास और खुशहाली लेकर आती हैं। जहां सड़कें नहीं पहुंची हैं, वहां कहीं ना कहीं भय, असुरक्षा, समाज से कटे रहने की रिवायत अब भी बनी हुई है। पूवर्ती और एंटापाड़ गांव दशकों से पहुंच से दूर रहने के कारण नक्सलियों का गढ़ माने जाते थे। हिंसा पीड़ित आदिवासियों में खौफ का माहौल था। पूवर्तीं, टेकलगुड़म, सिलगेर, जगरगुंडा, चिंताबागू, चिंतलनार, ताड़मेटला, चिंतागुफा, डब्बाकोटा जैसे इलाकों में हिंसा, अशिक्षा और गरीबी व्याप्त थी। सीमेंट-डामर की सड़कों ने इस इलाके की तस्वीर बदल दी है। एंटापाड़, पेंटापाड़, भूतलंका, पुजारीकांकेर जैसे कई इलाके हैं जहां सड़क ना पहुंचने का साफ अंतर दिखता है।

स्कूल जाते हैं गांव के बच्चे
सिलगेर से 12 किमी दूर पूवर्ती में सड़क और पुल का काम तेजी से चल रहा है। गांव में बच्चे स्कूल जाते हैं। पूवर्ती में बिजली नहीं है, लेकिन हर घर में सोलर पैनल लगे हैं। नक्सली कमांडर हिड़मा का घर जमींदोज हो गया है मगर सोलर पैनल सुरक्षित हैं। आंगनबाड़ी केंद्र भी हैं और सोलर पंप से पानी मिलता है। राशन भी आसानी से उपलब्ध है।

देवा के घर पहुंचने नहीं है सड़क
हिड़मा के घर से 3 किमी दूर ओईपारा मुहल्ले में देवा बारसे का घर है, जहां पहुंचने के लिए सड़क नहीं है। यहां ज्यादातर सोलर पैनल और एक पंप भी खराब पड़ा था। पूवर्ती से 80 किमी दूर डब्बाकोंटा तक सड़क है। यहां से जंगलों में 5 किमी चलकर एंटापाद पहुंचा जा सकता है। केसा सोड़ी के गांव में नल-जल योजना के ढांचे बने हैं पर पानी नहीं आता। ज्यादातर बच्चे पढ़ाई छोड़ चुके हैं।

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