April 23, 2026

छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट का बड़ा फैसला : संविलयन से पहले की सेवा भी पेंशन में शामिल होगी, राज्य सरकार की अपील खारिज, शिक्षकों को बड़ी राहत

CG HIGHCOURT

बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने शिक्षकों के हित में एक अहम और ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। कोर्ट ने साफ किया कि संविलयन से पहले की सेवा अवधि को भी पेंशन में जोड़ा जाएगा। यह फैसला लंबे समय से चल रही मांग और विवाद पर विराम लगाने वाला माना जा रहा है। इससे राज्य के हजारों एलबी संवर्ग के शिक्षकों को राहत मिली है, जो अपनी पूरी सेवा अवधि को पेंशन में शामिल कराने के लिए संघर्ष कर रहे थे और कई बार प्रशासन के चक्कर लगा चुके थे।

राजेंद्र प्रसाद केस बना आधार
यह पूरा मामला चिरमिरी के शिक्षक राजेंद्र प्रसाद से जुड़ा हुआ था, जिन्होंने अपनी सेवा के वर्षों को पेंशन में जोड़ने की मांग को लेकर अदालत का दरवाजा खटखटाया था। सिंगल बेंच ने पहले ही उनके पक्ष में फैसला सुनाते हुए पूरी सेवा अवधि को मान्यता दी थी। इस फैसले ने अन्य शिक्षकों को भी उम्मीद दी और मामला धीरे धीरे पूरे राज्य के शिक्षकों के अधिकार से जुड़ा एक बड़ा मुद्दा बन गया।

सरकार की अपील खारिज
सिंगल बेंच के फैसले से असहमत राज्य सरकार ने इस निर्णय को डिवीजन बेंच में चुनौती दी थी। सरकार का तर्क था कि केवल संविलयन के बाद की सेवा को ही पेंशन में गिना जाना चाहिए। लेकिन डिवीजन बेंच ने इस दलील को खारिज कर दिया और पहले दिए गए फैसले को बरकरार रखा। कोर्ट ने कहा कि कर्मचारी की पूरी सेवा को नजरअंदाज करना न्यायसंगत नहीं है और इससे कर्मचारियों के अधिकारों का हनन होता है।

हजारों शिक्षकों को मिलेगा लाभ
इस फैसले का सीधा लाभ राज्य के हजारों एलबी संवर्ग के शिक्षकों को मिलेगा, जो वर्षों से इस मुद्दे को लेकर परेशान थे। अब उनकी संविलयन से पहले की सेवा भी पेंशन निर्धारण में शामिल की जाएगी, जिससे उनकी पेंशन राशि में वृद्धि होगी। यह निर्णय शिक्षकों के आर्थिक भविष्य को मजबूत करने वाला साबित होगा और उन्हें सेवानिवृत्ति के बाद बेहतर सुरक्षा प्रदान करेगा।

बनेगा बड़ा नजीर
विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला आने वाले समय में ऐसे मामलों के लिए एक महत्वपूर्ण नजीर बनेगा। अब अन्य कर्मचारी भी इस आधार पर अपने अधिकारों के लिए न्यायालय का रुख कर सकते हैं। हाईकोर्ट ने अपने आदेश में यह स्पष्ट कर दिया है कि पेंशन का निर्धारण पूरी सेवा अवधि को जोड़कर ही किया जाना चाहिए। इस फैसले को शिक्षा क्षेत्र में एक बड़ी जीत के रूप में देखा जा रहा है।

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