CG : रायपुर सेंट्रल जेल में बंदी देख रहे देशभक्ति फिल्में, थियेटर में सिनेमा देखकर बदल रहे सोच
रायपुर। बंदी सुधार गृह जैसा नाम से ही जाहिर है, वो जगह जहां बंदियों को सुधरने का मौका मिलता है. जेल नाम सुनते ही मन में अपराधी और खूंखार कैदियों की तस्वीरें उभरती हैं.हम में से कई लोगों के मन में यही धारणा है कि जेल एक ऐसी जगह है जहां लोगों को उनके किए की सजा मिलती है.साथ ही साथ बंदियों को बिल्कुल मुश्किल भरे दौर में अपनी सजा काटनी पड़ती है.लेकिन हमारी सोच से अलग जेल की एक और तस्वीर भी है.ये तस्वीर है उन अपराधियों को सुधरने का मौका देने की.जेल में सिर्फ इंसान अपने किए की सजा ही नहीं भुगतता बल्कि अपने आपको सुधारने का एक और मौका पाता है.आज हम आपको ऐसी ही एक जेल की तस्वीर दिखाएंगे जहां बंदी देश के प्रति कुछ कर गुजरने का जज्बा अपने अंदर पैदा कर रहे हैं.

रायपुर सेंट्रल जेल में पहली बार बंदियों को देशभक्ति से ओतप्रोत फिल्म बार्डर दिखाई गई.इस फिल्म को दिखाने का मकसद सिर्फ इतना था कि बंदियों का मानसिक और नैतिक उत्थान हो सके.साथ ही साथ नकारात्मक सोच सकात्मकता में बदले.रायपुर सेंट्रल जेल प्रबंधन अप्रैल माह से बंदियों को प्रोजेक्टर के माध्यम से फिल्म दिखा रहा है. बंदियों को फिल्म दिखाने के लिए एक थिएटर भी बनाया गया है. जिसमें पहली बार लगभग 200 बंदियों ने बॉर्डर फिल्म देखी. फिल्म देखने के बाद बातचीत करते हुए बंदी काफी उत्साहित नजर आए. बंदियों का कहना था कि उन्हें सामाजिक प्रेम, देशभक्ति का जज्बा जैसी कई चीजें फिल्म में देखने को मिली.
बंदी संदीप गुप्ता ने बताया कि सेंट्रल जेल की सभागार में बड़े पर्दे पर बॉर्डर फिल्म देखने का मौका मिला. बॉर्डर फिल्म में पारिवारिक और देशभक्ति का जो भाव दिखा उसने हमारे मन को अंदर तक झकझोर दिया. हमें आज कहां होना चाहिए और हम आज कहां हैं. भविष्य में भी इस तरह की फिल्में दिखाई जाती है तो बहुत अच्छा रहेगा. इसके लिए हम जेल प्रबंधन को धन्यवाद करते हैं. बड़े पर्दे पर बॉर्डर फिल्म केवल मैं ही नहीं बल्कि बहुत सारे बंदियों ने देखा है और एक दूसरे से अपने फीलिंग को साझा किया.
सभी बंदी शांति से बॉर्डर फिल्म देखें. बड़ा पर्दा होने के साथ ही साउंड सिस्टम भी लगाया गया था. यह भी महसूस नहीं हुआ कि हम जेल में बैठकर मूवी देख रहे हैं. फिल्म को देखने से देशभक्ति का जज्बा पैदा हुआ कि हमको भी उसी जगह पर होना चाहिए था. बॉर्डर फिल्म में इस बात को फिल्माया गया है कि हीरो के परिवार में भी कई तरह की समस्याएं और दिक्कत होने के बावजूद वह बॉर्डर पर दिन-रात डटा हुआ है और हम कहीं ना कहीं अपनी छोटी-मोटी समस्याओं को लेकर गलत रास्ते पर चलकर आज इस जगह पर पहुंच गए. भविष्य में हम गलत रास्ते पर नहीं चलेंगे- संदीप गुप्ता, बंदी
बंदी सतीश नेताम ने बताया कि फिल्म देखकर काफी अच्छा लगा बड़ा प्रोजेक्टर लगाकर सभी बंदी को फिल्म दिखाई गई . देश भक्ति और राष्ट्र प्रेम से ओतप्रोत मूवी दिखाई गई. हर सप्ताह इसी तरह की मूवी देखने को मिलेगा तो अपराधिक प्रवृत्ति के बंदियों के मन में देशभक्ति और राष्ट्र प्रेम की भावना जागृत होगी. बंदी ने आगे बताया कि पूरी फिल्म दोपहर 2 बजे से लेकर 5 तक दिखाई गई. फिल्म को देखने से हमें यह सीख मिली कि हम गलत रास्ते पर ना चल कर देश प्रेम और भक्ति भावना का परिचय दें.

सेंट्रल जेल के अधीक्षक अमित शांडिल्य के मुताबिक जेल पहले की विचारधारा पर नहीं चल रहा है. अब जेल का नाम बदल गया.अब यह जेल एवं सुधारात्मक सेवाएं हो गया है. जिसके तहत कारावास के अतिरिक्त बंदियों को सुधार की ओर ले जाना है. जिससे वह समाज की मुख्य धारा में सम्मिलित हो सके. इसी उद्देश्य से बंदियों की मानसिक और नैतिक उत्थान के लिए केंद्रीय जेल रायपुर में एक प्रोजेक्टर के माध्यम से फिल्में दिखाने का प्रयास किया गया है.
जेल प्रबंधन के पास साउंड सिस्टम और प्रोजेक्टर और पर्दा भी मौजूद है. प्रत्येक शनिवार को बंदियों को राष्ट्र प्रेम सामाजिक समरसता आत्म सुधार और नैतिक मूल्यों से संबंधित फिल्में दिखाई जाएंगी. फिल्म दिखाने का मुख्य उद्देश्य बंदियों के मानसिक सोच में सकारात्मक बदलाव लाना. जेल प्रबंधन का मानना है कि बंदियों के मानसिक स्वास्थ्य को कैसे ठीक रखा जाए. इसी सोच को लेकर मूवी दिखाने का आइडिया आया- अमित शांडिल्य, जेल अधीक्षक
आपको बता दें कि इसके पहले रायपुर के सेंट्रल जेल के बंदी पेंटिंग और भागवत गीता में अपनी कला प्रतिभा और क्षमता का प्रदर्शन पहले ही कर चुके हैं. बंदियों के लिए बनाए गए इस थिएटर में बंदियों की ही बनाई गई पेंटिंग भी लगाई गई है.आपको बता दें कि रायपुर सेंट्रल जेल प्रबंधन का ये प्रयास वाकई नायाब है.क्योंकि जिन बंदियों ने गलत रास्ते पर चलते हुए सजा पाई,आज उन बंदियों के मन में खुद को देश के लिए समर्पित करने का जज्बा जाग रहा है.
