आदिवासी गांव से अंतरराष्ट्रीय पोडियम तक, 55 साल की महिला एथलीट ने स्वर्ण पदक जीतकर उम्र को दी मात
हैदराबाद । आंध्र प्रदेश के एक छोटे से आदिवासी गांव से मलेशिया के अंतरराष्ट्रीय पोडियम तक पहुंचने वाली मत्स्य कोंडम्मा (Matsya Kondamma) की यात्रा किसी असाधारण से कम नहीं है. 55 साल की उम्र में, उन्होंने 37वीं अंतरराष्ट्रीय मास्टर्स एथलेटिक्स चैंपियनशिप के भाला फेंक प्रतियोगिता (javelin throw) में स्वर्ण पदक जीतकर यह साबित कर दिया कि उम्र दृढ़ संकल्प का मुकाबला नहीं कर सकती.
आंध्र प्रदेश की मूलियापुट्टु गांव की रहने वाली कोंडम्मा ने पहली बार 12 वर्ष की आयु में भाला उठाया और खेलों से अपरिचित समुदाय के बीच रहने के बावजूद अपनी तकनीक में महारत हासिल कर ली.
वह गर्व के साथ ये बात कहती हैं कि उन्होंने हैदराबाद में छह साल तक विभिन्न खेलों का प्रशिक्षण लिया. उसी समय उन्हें भाला फेंक से परिचित कराया गया. उस वक्त उनके माता-पिता को यह भी नहीं पता था कि यह क्या है, इसके बावजूद उन्होंने उनका समर्थन किया.
पिछले कई दशकों में कोंडम्मा ने 100 से ज्यादा राष्ट्रीय स्तर की प्रतियोगिताओं में हिस्सा लिया है और 80 पदक जीते हैं. हालांकि आर्थिक तंगी की वजह से वह अक्सर विदेश में प्रतिस्पर्धा करने से चूक जाती थीं, लेकिन उन्होंने कभी भी प्रयास करना नहीं छोड़ा. इस साल उनकी लगन रंग लाई.
कोंडम्मा ने मलेशिया में जीता स्वर्ण पदक
मई में मलेशिया में भारत का प्रतिनिधित्व करते हुए, कोंडम्मा 21 देशों के एथलीटों को पछाड़ते हुए पोडियम पर सबसे ऊपर खड़ी थीं. उन्होंने कहा कि वहां (मलेशिया) स्वर्ण जीतना एक सपने के सच होने जैसा था. मैंने पहले कई अंतरराष्ट्रीय अवसरों को खो दिया था, लेकिन इस पल ने सब कुछ सार्थक बना दिया.
मत्स्य कोंडम्मा का जीवन संघर्ष
उनका जीवन संघर्ष से मुक्त नहीं रहा है. खेल कोटे के तहत आरटीसी (रोड ट्रांसपोर्ट कारपोरेशन) में शामिल होने के बाद, उनका खेल करियर रुक गया. 1996 में, उन्होंने फिर से एथलेटिक्स पर ध्यान केंद्रित करने के लिए आरटीसी से इस्तीफा दे दिया. 2011 में उन्हें उस समय मुश्किल दौर से गुजरना पड़ा जब उनके पति का निधन हो गया, जिससे उन्हें अकेले ही परिवार का पालन-पोषण करना पड़ा. लेकिन तब भी, उन्होंने भाला फेंकना नहीं छोड़ा.
कोंडम्मा ने ये भी कहा कि अपने बच्चों और विशाखापत्तनम के वेटरन एथलेटिक्स एसोसिएशन के सहयोग से मैंने प्रशिक्षण जारी रखा, इसके अलावा विशाखापत्तनम और अल्लूरी सीतारामाराजू जिलों के कलेक्टरों ने मलेशिया मीट में भाग लेने के लिए मेरी आर्थिक मदद की, जिसको को मैं कभी नहीं भूलूंगी.
कोंडम्मा पावर लिफ्टिंग और डिस्कस थ्रो की भी शौकीन हैं
उनकी उपलब्धियां सिर्फ भाला फेंक तक ही सीमित नहीं हैं. कोंडम्मा पावर लिफ्टिंग और डिस्कस थ्रो की भी शौकीन हैं. इस साल मार्च में, उन्होंने पेधा गंटियाडा में आयोजित राज्य स्तरीय पावर लिफ्टिंग चैंपियनशिप में प्रथम पुरस्कार जीती थीं. उनके बच्चे, उनकी हिम्मत से प्रेरित होकर अब अपने पेशे में सेटल हो गए हैं. सबसे बड़ा बेटा बॉक्सिंग कोच है, जबकि उनकी बेटी और दूसरा बेटा सॉफ्टवेयर इंजीनियर हैं.
कोंडम्मा एक सच्चे चैंपियन के संकल्प के साथ आगे कहती हैं, ‘मुझे उम्मीद है कि जब तक मुझमें ताकत है, मैं प्रतिस्पर्धा जारी रखूंगी और देश के लिए पदक जीतना चाहती हूं.’
