January 22, 2026

देश का सबसे बड़ा ढोल ‘भोगम’ : CG के रिखी ने रखा है 211 लोक वाद्य यंत्रों का संग्रह, विरासत में मिली संगीत की परंपरा

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रायपुर। छत्तीसगढ़ के भिलाई के मरोदा सेक्टर के रहने वाले रिखी क्षत्रिय दुर्लभ लोकवाद्य यंत्रों का संग्रह करते हैं. उनकी उम्र 66 वर्ष है. पिछले 43 साल से वह वाद्ययंत्रों का कलेक्शन कर रहे हैं. बचपन से ही वाद्ययंत्रों से ऐसा जुड़ाव हुआ कि यह उनके जीवन का लक्ष्य ही बन गया. छत्तीसगढ़ के लोक वाद्य यंत्रों को संग्रह करने वाले रिखी क्षत्रिय पहले बीएसपी में नौकरी किया करते थे. 60 की उम्र में रिटायर हुए. रिखी क्षत्रिय लोक गायन और लोक वाद्य यंत्रों की प्रस्तुति दिल्ली के राजपथ में 26 जनवरी के समय 11 बार दे चुके हैं।

दुर्लभ लोकवाद्य संग्राहक: रिखी क्षत्रिय का दावा है कि महीना भर पहले ही बीजापुर से ऐसा ढोल लेकर आया हूं, जो देश का सबसे बड़ा और वजनदार ढोल है. इस ढोल का नाम भोगम है. इसका वजन 100 किलोग्राम है. इसे दो कलाकार मिलकर कंधे में रखकर बजाते हैं.

मुरिया आदिवासी: रिखी बताते हैं कि बीजापुर इलाके में मुरिया आदिवासी रहते हैं. उन्हीं से यह ढोल खरीद कर लाया हूं. इस ढोल का उपयोग आदिवासी अपने देवी देवताओं की पूजा पाठ और वैवाहिक कार्यक्रमों में करते हैं. इस ढोल की लंबाई 3 फीट है और इसका व्यास 2 फीट है.

सबसे बढ़ा ढोल: इस ढोल को बजाने के लिए दो कलाकारों की आवश्यकता होती है. एक बड़े से डंडे में कंधे में रखकर बजाने के साथ ही नृत्य करना होता है. इस ढोल का निर्माण बीजा और सरई की लकड़ी से हुआ है. रिखी क्षत्रिय ने बीजापुर के आदिवासियों से आग्रह किया, तब जाकर कहीं यह ढोल रिखी क्षत्रिय को मिल पाया.

कलाकार के पास वाद्ययंत्रों का दुर्लभ खजाना: इस ढोल जैसे वाद्ययंत्र के साथ ही रिखी के पास 211 प्रकार के वाद्य यंत्र हैं, जो शिकार करने और शिकार से बचने के काम भी आता है. इन वाद्ययंत्रों से जानवर और पशु पक्षियों के आवाज निकालकर भी रिखी क्षत्रिय ने दिखाया. जिसमें घुमरा, तुरही, तोड़ी, कुतुर्गी, हुलकी, झंडी, डंडा, खजेरी, चटकोला, भेर, चीवारा, तंबूरा, मादर चिटकुल जैसे तमाम वाद्य यंत्र इनके संग्रहालय में मौजूद हैं.

लोक रागिनी: रिखी क्षत्रिय बताते हैं कि एक सांस्कृतिक संस्था भी बनाई है, जिसका नाम लोक रागिनी है. इस संस्था में 35 कलाकार हैं. बचपन से बड़े होते तक की पढ़ाई लिखाई भिलाई में की, जिसके बाद खैरागढ़ के इंदिरा कला संगीत विश्वविद्यालय से इन्होंने साल 2005 में संगीत में PHD भी किया है. पीएचडी करने के पीछे उनका मकसद संगीत से जुड़ाव था.

पिता का भी संगीत से था जुड़ाव: रिखी ने बताया कि “मेरे पिताजी संगीतकार थे और भजन मंडली के मुखिया हुआ करते थे. साल 1960 में मेरी उम्र 5 साल की थी. मैं खिलौनों से खेलने के बजाय पिता के पास रखे हुए इन्हीं वाद्ययंत्रों को खेलकर बड़ा हुआ.

विरासत में मिली संगीत की परंपरा: बचपन में ही लोक वाद्य यंत्र संग्रह करने का निश्चय किया. इन्हीं वाद्य यंत्रों को खेलकर पला बढ़ा. अपने पिता के साथ भजन मंडली में जाने के बाद खुद भी भजन और गायन शुरू कर दिया. इसके बाद एक सांस्कृतिक संस्था लोक मंजरी शुरू की.

संस्कृति मंत्रालय: भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय के द्वारा साल 1982 में लोक वाद्ययंत्र, पहनावा और बोली पर रिसर्च करने का मौका मिला. मुझे संगीत का एक्सपर्ट बनाया गया, जिसके बाद आगे चलकर गीत संगीत और वाद्य यंत्र का समूह ढूंढा. इसी दौरान आदिवासियों के कई ऐसे वाद्ययंत्र मिले, जिसने मेरे मन को झकझोर कर रख दिया. साल1982 के बाद वाद्य यंत्र संग्रह करने में अपना समय व्यतीत करने लगा. अबतक 211 वाद्ययंत्र संग्रहित किए हैं. इन वाद्य यंत्रों को बजाने के साथ ही बनाने की कला भी सीखते हैं.

रिखी पहले बीएसपी में नौकरी किया करते थे. 60 की उम्र में रिटायर हुए. रिखी क्षत्रिय लोक गायन और लोक वाद्य यंत्रों की प्रस्तुति दिल्ली के राजपथ में 26 जनवरी के समय 11 बार दे चुके हैं.

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