January 23, 2026

अबूझमाड़ की एक आत्मनिर्भर बस्ती : कोड़तामरका गांव, जहां ना सड़क है, ना स्कूल, ना डॉक्टर, फिर भी संगठित व्यवस्था से संघर्ष कर रहा गांव

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नारायणपुर। छत्तीसगढ़ के अबूझमाड़ अंचल में कोड़तामरका गांव है. यह एक ऐसा गांव है, जो आजादी के दशकों बाद भी सड़क, स्कूल, स्वास्थ्य, बिजली और पीने के पानी जैसी बुनियादी सुविधाओं से महरूम है. कोड़तामरका गांव तक पहुंचने के लिए घने जंगल, उफनती नदियां और पथरीले रास्तों से गुजरना पड़ता है. नारायणपुर जिला मुख्यालय से कुतुल की दूरी करीब 40 किमी है. कुतल से कोड़तामरका गांव की दूरी 20 किमी है. गांव तक पहुंचने के लिए 3 घंटे तक मुश्किल भरे रास्तों से होकर गुजरना पड़ता है.

कोड़तामरका गांव के लोग अभावों के बावजूद अपने जीवन को सामूहिकता और जुगाड़ से आगे बढ़ा रहे हैं. जनरपट ने इस दुर्गम गांव की यात्रा कर वहां की जमीनी सच्चाई और उम्मीद दोनों को अपनी आंखों से देखा और महसूस किया.

अबूझमाड़ की छांव में संघर्ष करता गांव: कोड़तामरका गांव नारायणपुर जिले के सबसे दुर्गम गांवों में गिना जाता है. यह क्षेत्र दशकों से नक्सल प्रभाव में रहा है, जिसकी वजह से विकास की रफ्तार यहां कभी नहीं पहुंची. आस पास के इलाकों जैसे कुतुल, बेड़ामाकोटी, पद्मकोट और नेलांगुर में पुलिस कैंप बनने से हाल के वर्षों में कुछ उम्मीद जगी है, लेकिन हकीकत अब भी कोसों दूर है. इनकी हर सुबह संघर्ष से शुरु होती है और रात अगले दिन के संघर्ष की तैयारियों में बीतती है.

सड़क नहीं, फिर भी चलते हैं मीलों: जनरपट की टीम गांव तक पहुंचने के लिए तेज बारिश, कीचड़ और फिसलन वाले ऐसे घने जंगलों से होकर गुजरी जो खूंखार जंगली जानवरों का प्राकृतिक आशियाना है. हमारी टीम ने दो घंटे से ज्यादा का पैदल सफर तय किया. रास्ते में कई जानलेवा नाले और उफनती बरसाती नदियां पार करनी पड़ी. ठीक वही रास्ता, जिसे ग्रामीण हर दिन अपनी जान जोखिम में डालकर पार करते हैं, अपनी रोजमर्रा की जरूरतों को पूरा करने के लिए.

फ्री राशन के लिए जोखिम में जान: गांव के लोगों को सरकार से मुफ्त मिलने वाला 35 किलो चावल प्राप्त करने के लिए गांव से कई किलोमीटर दूर धुरबेड़ा तक पैदल जाना पड़ता है. इस दौरान उन्हें जंगल, नाले और फिसलन भरे रास्तों से होकर गुजरना पड़ता है. यानी एक चावल की बोरी के लिए जान जोखिम में डालनी पड़ती है. पीडीएस से मिले चावल की बोरी को गांव वाले कंधे पर उठाकर दो पहाड़ पार कर गांव पहुंचते हैं. जिस रास्ते पर पैदल चलना मुश्किल होता है उस रास्ते पर 40 किलो का वजन उठाकर चलना कितना कठिन होता होगा सहज अनुमान लगाया जा सकता है.

स्कूल नहीं, आंगनबाड़ी में कार्यकर्ता नहीं, पढ़ाई सपना बन गया: गांव में न तो कोई स्कूल है और न ही आंगनबाड़ी भवन, एक टूटी झोपड़ी में संचालित आंगनबाड़ी केंद्र है लेकिन यहां कोई आंगनबाड़ी कार्यकर्ता नहीं आता है. ग्रामीणों के अनुसार गांव में करीब 30 से अधिक छोटे-छोटे बच्चे हैं, जो शिक्षा से पूरी तरह वंचित हैं. शासन यदि ईरक भट्टी में 5 बच्चों के लिए स्कूल खोलता है और अपनी वाहवाही लूटता है तो यहां 30 बच्चों के बावजूद शिक्षा की कोई व्यवस्था न होना कई सवाल भी खड़े करता है.

नक्सल स्मारक और गांव में फैला डर का साया: गांव के रास्ते में तीन नक्सली स्मारक दिखाई दिए. जिनमें से एक पर कुख्यात नक्सली साकेत का नाम और मारे जाने की तारीख दर्ज थी, बाकी दो स्मारक हाल के वर्षों में बनाए गए मालूम पड़ते हैं. इससे साफ होता है कि नक्सल प्रभाव अब भी यहां की जमीन पर गहरा है.

नक्सली स्मारक ग्रामीणों के बीच भय का वातावरण बनाए रखते हैं. गांव के मध्य में नक्सली शोभाराय और नक्सली ममता के नाम का स्मारक भी बना हुआ है, जिसे पुलिस के द्वारा हल्का तोड़ा गया है. दरअसल पुलिस के जवान जब इन क्षेत्रों में पहुंचते हैं तो नक्सलियों की निशानी के तौर पर मौजूद ऐसे स्मारक को ध्वस्त कर देते हैं, ताकि नक्सल भय और विचारधारा को प्रसारित करने से रोका जा सके.

गांव में पक्का पुल नहीं, लेकिन देसी जुगाड़ का दिखता है कमाल: गांव में बहने वाली नदी पर ग्रामीणों ने बांस और लकड़ी से एक स्थानीय जुगाड़ पुल तैयार किया है. बारिश में जब नदी का जलस्तर जानलेवा होता है तो यही पुल ग्रामीणों का जीवन रक्षक बन जाता है. यह ग्रामीणों की देशी इंजीनियरिंग और आत्मनिर्भरता का जीता जागता उदाहरण है. जहां विकास पहुंचाने के लिए शासन प्रशासन के पांव फूल जाते हैं, वहां पर ग्रामीणों ने देशी इंजीनियरिंग का बेजोड़ उदाहरण प्रस्तुत करते हुए शासन प्रशासन के गाल पर तमाचा जड़ा है.

सोलर लाइट और वाटर टैंक, अधूरी योजनाओं की तस्वीर: शासन प्रशासन ने विकास के नाम पर गांव में 3-4 साल पहले सोलर लाइटें दी थीं, जो अब ज्यादातर खराब हो चुकी हैं. हाल ही में एक सोलर वाटर टैंक लगाया गया, लेकिन उसकी पाइपलाइन से आज तक किसी घर तक पानी नहीं पहुंचा. रोशनी देने वाला मिट्टी का तेल पहले ही सरकार ने बंद कर दिया है, गांव तक बिजली नहीं पहुंची है और सोलर लाइट की रोशनी अब धुंधली पड़ने लगी है.

सीखी खेती, अब बन रही जीवनदायिनी: गांव के एक युवा ने बताया कि अतीत में ग्रामीणों ने खेती करना और हल चलाना सीखाा. रामकृष्ण मिशन में शिक्षा ली और अब अपने गांव लौटकर खेती कर रहा है.

न शिक्षा, न स्वास्थ्य, फिर भी संगठित व्यवस्था: गांव में कोई पक्की सड़क, पुल, मकान, स्कूल, अस्पताल नहीं है. महीने में मुश्किल से एक बार स्वास्थ्य कार्यकर्ता आता है और दवा छोड़ जाता है. गंभीर मरीजों को ”कांवड़” में उठाकर कुतुल तक लाया जाता है और वहां से जिला अस्पताल भेजा जाता है. आंगनबाड़ी कार्यकर्ता कभी गांव नहीं आती. बावजूद इसके गांव संगठित तौर पर परेशानियों का हल निकाल कर इस चुनौतीपूर्ण हालात में यहां के लोग रह रहे हैं.

शराब पर स्वयंसेवी प्रतिबंध, कार्यों में आपसी सहयोग: गांव के लोगों ने आपसी सहमति से गांव में शराब पीना और बेचना प्रतिबंधित कर रखा है. चाहे खेत जोतना हो, घर बनाना हो, सड़क पर मिट्टी डालनी हो या सामाजिक उत्सव, गांव के सभी लोग मिलकर सामूहिक रूप से कार्य करते हैं. जिसकी एक झलक तब देखने को मिली, जब हमने रात बिताने के लिए गांव के घोटूल में ठहरने का फैसला लिया.

ग्रामीणों ने हमारे भोजन और ठहरने की व्यवस्था सामूहिक रूप से की और जब सुबह हमारी नींद खुली तो देखा सुबह 7 बजे गांव के घोटूल में ग्रामीण एकत्रित हुए. वे आज के काम तय कर रहे थे, जैसे किसे खेत जाना है, कौन सड़क में मिट्टी डालेगा और कहां सामूहिक सफाई होगी. यहां हर काम सामाजिक सहयोग से होता है, चाहे खेती हो, शादी-ब्याह हो या रास्ता बनाना.

प्राकृतिक संसाधनों का बुद्धिमत्तापूर्ण उपयोग: गांव के सभी मकान मिट्टी, लकड़ी, पत्थर और बांस से बनाए गए हैं. पशुओं के लिए अलग बाड़ा, जल निकासी की व्यवस्था और साफ सुथरा वातावरण. यह सब दर्शाते हैं कि ये लोग आत्मनिर्भर हैं, संगठित हैं और हर परिस्थिति में जीवन जीने की मजबूत क्षमता रखते हैं.

कोड़तामरका गांव अबूझमाड़ की उस सच्चाई को बयां करता है, जिसे अक्सर उपेक्षित कर दिया जाता है. नक्सलवाद के साये में पले-बढ़े इन ग्रामीणों ने आत्मनिर्भरता और सामाजिक संगठन के बल पर वह कर दिखाया है, जो सरकारें करोड़ों खर्च कर भी नहीं कर पाई हैं. अब वक्त है कि शासन-प्रशासन केवल पुलिस कैंप ही नहीं, बल्कि शिक्षा, स्वास्थ्य, सड़क और रोजगार जैसी असली जरूरतों को प्राथमिकता दे.

कोड़तामरका जैसे गांव केवल सरकार की योजनाओं के दावों की नहीं, ईमानदार क्रियान्वयन की प्रतीक्षा कर रहे हैं. सवाल यह नहीं कि सरकार कब जागेगी, बल्कि यह है कि कब तक ऐसे गांव अंधेरे में रहेंगे जबकि उनके पास रोशनी खुद पैदा करने की क्षमता है.

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