करोड़ों की अनियमितता : बेमेतरा CMO नरेश वर्मा सस्पेंड, सूडा जांच में सामने आई वित्तीय गड़बड़ी
रायपुर। छत्तीसगढ़ (Chhattisgarh) के खैरागढ़ जिले में मुख्यमंत्री शहरी स्लम स्वास्थ्य योजना (Mukhyamantri Shahari Slum Swasthya Yojana) के तहत वित्तीय अनियमितताओं का मामला सामने आया है। गरीब और झुग्गी-झोपड़ी में रहने वाले लोगों को बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएं देने के उद्देश्य से शुरू की गई इस योजना में करोड़ों रुपये की गड़बड़ी उजागर हुई है।
नगरीय प्रशासन एवं विकास विभाग (Urban Administration and Development Department) ने तत्कालीन कवर्धा नगर पालिका (Kawardha Municipality) के मुख्य नगर पालिका अधिकारी (CMO) नरेश वर्मा (Naresh Verma) को निलंबित कर दिया है। वर्तमान में वे बेमेतरा नगर पालिका (Bemetara Municipality) में पदस्थ थे। निलंबन अवधि में उन्हें दुर्ग स्थित संयुक्त संचालक कार्यालय से संबद्ध किया गया है।
शिकायत के बाद शुरू हुई जांच
इस पूरे मामले की शुरुआत भाजपा नेता और खैरागढ़ जिले के पूर्व जिला भाजपा महामंत्री रामाधार रजक (Ramadhar Rajak) की शिकायत से हुई। उन्होंने योजना में गड़बड़ियों को लेकर शासन और विभागीय अधिकारियों से शिकायत की थी। इसके बाद जांच प्रक्रिया शुरू की गई।
सूडा जांच में सामने आई वित्तीय गड़बड़ी
राज्य शहरी विकास अभिकरण (State Urban Development Agency – SUDA) ने जून 2025 में मामले की जांच की। जांच में पाया गया कि दवा खरीद, वितरण और भुगतान प्रक्रिया में पारदर्शिता का अभाव था और नियमों का पालन नहीं किया गया। प्रारंभिक जांच में नरेश वर्मा को 20 लाख 80 हजार 380 रुपये की वित्तीय हानि के लिए जिम्मेदार मानते हुए वसूली का नोटिस जारी किया गया। बाद में विभाग ने विशेषज्ञ जांच समिति गठित कर दस्तावेजों की विस्तृत पड़ताल कराई।
एजेंसी पर नहीं लगाई पेनाल्टी
जांच समिति की दिसंबर 2025 की रिपोर्ट में खुलासा हुआ कि मोबाइल मेडिकल यूनिट (Mobile Medical Unit – MMU) संचालित करने वाली एजेंसी पर नियमानुसार अर्थदंड नहीं लगाया गया। जिला अर्बन पब्लिक सर्विस सोसायटी (District Urban Public Service Society) के स्पष्ट निर्देशों के बावजूद पेनाल्टी नहीं लगाने से शासन को लगभग 25 लाख 91 हजार 500 रुपये की अतिरिक्त हानि हुई।
साथ ही एजेंसी को निर्धारित दर से अधिक भुगतान किया गया। दवा खरीद और वितरण में 2 लाख 13 हजार 497 रुपये के अपव्यय सहित कुल 23 लाख 8 हजार 380 रुपये की वित्तीय गड़बड़ी दर्ज की गई। हैरानी की बात यह रही कि इसमें से केवल 2 लाख 28 हजार रुपये की ही वसूली हुई।
एफआईआर की अनुशंसा
जांच समिति ने मामले को गंभीर कदाचार और वित्तीय अनियमितता की श्रेणी में रखा। समिति ने नरेश वर्मा के खिलाफ कठोर अनुशासनात्मक कार्रवाई, अतिरिक्त भुगतान की वसूली और एफआईआर दर्ज करने की अनुशंसा की। फिलहाल विभाग ने सेवा शर्तों के उल्लंघन और वित्तीय अनुशासनहीनता मानते हुए निलंबन की कार्रवाई की है। विभाग का कहना है कि शासन को हुई पूरी वित्तीय हानि की वसूली संबंधित अधिकारी से की जाएगी।
जवाबदेही पर उठे सवाल
इस पूरे प्रकरण ने प्रशासनिक हलकों में हलचल मचा दी है। जब जांच समिति ने आपराधिक कार्रवाई की सिफारिश की है, तो अब निगाहें इस बात पर हैं कि क्या आगे एफआईआर दर्ज होगी या मामला निलंबन और वसूली तक सीमित रहेगा। जनहित की योजनाओं में इस तरह की गड़बड़ी ने पारदर्शिता और जवाबदेही पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
