CG : 13 साल बाद हाईकोर्ट का बड़ा फैसला, भाटापारा में RI की नियुक्ति निरस्त, चयन प्रक्रिया पर उठे पक्षपात के सवाल
बिलासपुर। छत्तीसगढ़ के बलौदा बाजार-भाटापारा जिले में नगर पालिका परिषद भाटापारा में 13 वर्षों से पदस्थ राजस्व उप निरीक्षक की नियुक्ति को हाईकोर्ट ने निरस्त कर दिया है। यह मामला वर्ष 2012 में जारी भर्ती विज्ञापन से जुड़ा है, जिसमें स्नातक और पीजीडीसीए योग्यता अनिवार्य रखी गई थी। भाटापारा निवासी देवेंद्र कुमार साहू ने निर्धारित समय सीमा के भीतर सभी आवश्यक दस्तावेजों के साथ आवेदन किया था, लेकिन जब पात्र और अपात्र अभ्यर्थियों की सूची जारी हुई तो उनका नाम किसी भी सूची में शामिल नहीं किया गया। इस पूरी प्रक्रिया ने शुरुआत से ही सवाल खड़े कर दिए थे।
सूची से नाम गायब, उठे पारदर्शिता पर सवाल
आवेदन जमा करने के बावजूद देवेंद्र कुमार साहू का नाम चयन प्रक्रिया से बाहर रहना उनके लिए चौंकाने वाला था। उन्होंने सूचना के अधिकार अधिनियम 2005 के तहत दस्तावेज प्राप्त किए, जिससे यह स्पष्ट हुआ कि उनका आवेदन विधिवत स्वीकार किया गया था। इसके बावजूद उन्हें पात्रता सूची में शामिल नहीं करना गंभीर लापरवाही या जानबूझकर की गई कार्रवाई मानी गई। यह मामला सिर्फ एक उम्मीदवार का नहीं बल्कि पूरी चयन प्रक्रिया की पारदर्शिता पर सवाल खड़े करता है, जिससे भर्ती प्रणाली की विश्वसनीयता प्रभावित होती है।
विवादित नियुक्ति और पारिवारिक संबंधों का आरोप
23 मार्च 2013 को जारी नियुक्ति आदेश में सतीश सिंह चौहान को पद पर नियुक्त कर दिया गया था। याचिकाकर्ता की ओर से यह तर्क रखा गया कि चयन प्रक्रिया निष्पक्ष नहीं थी, क्योंकि उस समय सतीश सिंह चौहान के पिता नगर पालिका परिषद में मुख्य नगर पालिका अधिकारी के पद पर पदस्थ थे। इतना ही नहीं, उनके अनुभव प्रमाण पत्र भी उनके पिता द्वारा जारी किए गए थे, जिससे पूरी प्रक्रिया संदिग्ध प्रतीत होती है। इस आधार पर पक्षपात और मनमानी की आशंका को बल मिला और मामला न्यायालय तक पहुंचा।
हाईकोर्ट ने माना चयन प्रक्रिया में गंभीर त्रुटि
मामले की सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने सभी तथ्यों का बारीकी से परीक्षण किया। न्यायालय ने पाया कि याचिकाकर्ता का आवेदन मौजूद होने के बावजूद उसे सूची में शामिल नहीं करना गंभीर त्रुटि है। कोर्ट ने कहा कि किसी योग्य अभ्यर्थी को इस तरह बाहर करना चयन प्रक्रिया की निष्पक्षता को प्रभावित करता है। साथ ही यह भी माना गया कि चयन में पारिवारिक प्रभाव और पक्षपात की संभावना को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। दालत ने स्पष्ट किया कि ऐसी प्रक्रियाएं प्रशासनिक पारदर्शिता के मूल सिद्धांतों के खिलाफ हैं।
नई प्रक्रिया के निर्देश, फिर से होगा चयन
हाईकोर्ट ने 23 मार्च 2013 के नियुक्ति आदेश को निरस्त करते हुए नई और पारदर्शी चयन प्रक्रिया अपनाने के निर्देश दिए हैं। साथ ही यह भी कहा गया है कि देवेंद्र कुमार साहू की उम्मीदवारी पर विधिवत विचार किया जाए और निष्पक्ष तरीके से नया नियुक्ति आदेश जारी किया जाए। इस फैसले ने न सिर्फ एक पुराने मामले को न्याय दिलाया है बल्कि सरकारी भर्तियों में पारदर्शिता और जवाबदेही की आवश्यकता को भी रेखांकित किया है। अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि नई प्रक्रिया किस तरह से निष्पक्षता सुनिश्चित करती है।
