GOOD NEWS : जिनके नाम के ‘खौफ’ खाता था बस्तर वही नक्सली लिख रहे नई इबादत, जिन हाथों में रहती थी बंदूक वो सीख रहे नया हुनर
गरियाबंद। छत्तीसगढ़ में नक्सलवाद के खिलाफ निर्णायक लड़ाई लड़ी जा रही है। सेना के जवान जहां माओवादियों से सीधा मुकाबला कर रहे हैं। वहीं, दूसरी तरफ सरकार की सरेंडर पॉलिसी के कारण भी नक्सलियों का मन बदल रहा है। गरियाबंद जिले में सरेंडर कर चुके नक्सलियों का ऐसा ही मामला सामने आया है। जो कभी हथियार लेकर जंगलों में भटकते थे और आम लोगों की हत्याएं करते थे वही नक्सली अब अपनी नई जिंदगी के लिए ईमानदारी से मेहनत कर रहे हैं।
अब बंदूक नहीं, सुई धागा पकड़ना है, गोली नहीं, सपने बुनने हैं। गरियाबंद के लाइवली हुड कॉलेज में इन दिनों यह आवाज गूंज रही है। जिन्हें देखते ही कभी खौफ से जी भर जाता था आज वहां सीखने की ललक लिए सरकार के ट्रेनिंग प्रोग्राम में शामिल हो रहे हैं।
नक्सलियों ने बताई अपनी कहानी
सरेंडर कर चुकी नक्सली जानसी ने बताया कि उसके सिर पर 8 लाख रुपये का इनाम घोषित था। उसने 20 साल तक नक्सली संगठनों के लिए काम किया। उसके साथ झुमकी, मंजुला और रनीता पर भी 5-5 लाख का इनाम था। जबकि रमेश और संतराम पर भी 5-5 लाख का इनाम घोषित किया गया था। आज यह सभी लोग सरकार की पुनर्वास योजना की बदौलत लाइवलीहुड कॉलेज में नई राह तलाश रहे हैं।
महिला नक्सली सीख रही हैं कढ़ाई
चारों महिला नक्सली सिलाई, कढ़ाई और बुनाई सीख रही हैं। झुमकी हंसते हुए कहती है पहले जंगल में हर वक्त जान हथेली पर रहती थी, अब जिंदगी कढ़ाई के धागों में सजीव लगती है। वहीं मंजुला और झुमकी 10वीं कक्षा के प्राइवेट एग्जाम के लिए पढ़ाई की तैयारी में जुटी हैं। जबकि दोनों पुरुष नक्सली ड्राइविंग और प्लम्बिंग का काम सीख रहे हैं। संतराम का कहना है अब हम अपने बच्चों के लिए रोटी-कपड़ा ईमानदारी से जुटाना चाहते हैं। किसी को डरा कर या फिर उसके मेहनत की कमाई को लूटकर नहीं।
पूर्व नक्सलियों में सीखने की ललक
लाइवलीहुड परियोजना अधिकारी सृष्टि मिश्रा बताती हैं इनमें सीखने की ललक है। समय पर आते हैं, ईमानदारी से प्रशिक्षण लेते हैं। महिलाओं को सेल्स की ट्रेनिंग भी दी जा रही है और सुपर बाजार से ऑफर मिलना शुरू हो चुका है। जिन उंगलियों ने कभी ट्रिगर दबाया, वही अब सिलाई मशीन की टक-टक में नया संगीत गढ़ रही हैं। जिन पैरों ने जंगलों की पगडंडियां नापी थीं, वही अब आत्मनिर्भरता की ओर कदम बढ़ा रहे हैं।
एसपी ने कहा- बदलाव संभव है
गरियाबंद एसपी निखिल राखेचा ने बताया कि नक्सलियों के आत्मसमर्पण करने के बाद सरकार उनके पुनर्वास को लेकर पूरी तरह से गंभीर और संजीदा है। वह नक्सलियों के उत्थान के लिए कई तरह की योजनाओं का संचालन करवा रहे हैं ताकि उन्हें भविष्य में किसी तरह की कोई कठिनाई और परेशानी का सामना न करना पड़े। उन्होंने कहा कि बदलाव मुमकिन है, बस बंदूक की जगह अगर सुई-धागा और औजार थमा दिए जाएं।
