January 23, 2026

Rakshabandhan : द्रौपदी ने कृष्ण की उंगली पर बांधा था साड़ी का टुकड़ा, भारत के अलावा और कहां-कहां मनाया जाता है रक्षाबंधन

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Rakshabandhan 2025 : आज का दिन भाई-बहन के अटूट रिश्ते को समर्पित है। रक्षाबंधन का यह पावन त्योहार बहन के प्रेम और भाई की सुरक्षा के संकल्प का प्रतीक है। इस अवसर पर बहनें अपने भाइयों की कलाई पर राखी बांधकर उनकी लंबी उम्र और सुखद जीवन की कामना करती हैं, जबकि भाई जीवनभर उनकी रक्षा करने का वचन देते हैं।

सभी जानते हैं कि राखी भाई-बहन के रिश्ते का प्रतीक है, लेकिन बहुत कम लोग इसके पीछे छिपी पौराणिक कथाओं को विस्तार से जानते हैं। इस पर्व की जड़ें हमारे धर्म, संस्कृति और इतिहास में बहुत गहराई से जुड़ी हैं। इस त्योहार से जुड़ी कुछ प्रमुख कथाओं में द्रौपदी और श्रीकृष्ण, इंद्र और इंद्राणी, और राजा बलि और देवी लक्ष्मी की कहानियाँ प्रमुख हैं। इन प्रसंगों में राखी केवल एक धागा नहीं, बल्कि स्नेह, विश्वास और समर्पण का प्रतीक बनकर उभरती है।

कुछ मान्यताओं के अनुसार, रक्षाबंधन का त्योहार 5000 साल पुराना है। इतिहास में भी रानी कर्णावती और सम्राट हुमायूं की कहानी रक्षाबंधन की भावना को और अधिक व्यापक बनाती है, जहाँ राखी ने राजनीतिक और सामाजिक सीमाओं को भी पार कर दिया। चलिए जानते हैं राखी के त्योहार से जुड़ी इन सभी कथाओं के बारे में विस्तार से…

रक्षाबंधन से जुड़ी द्रौपदी और भगवान श्रीकृष्ण की कथा
रक्षाबंधन सिर्फ एक त्योहार नहीं, बल्कि रक्षा और रिश्तों की भावना का गहरा प्रतीक है। इस पर्व से जुड़ी एक प्रसिद्ध कथा द्रौपदी और भगवान श्रीकृष्ण की है, जो इस रिश्ते की महानता को दर्शाती है।

पौराणित कथा के अनुसार, एक बार श्रीकृष्ण और द्रौपदी साथ में पतंग उड़ा रहे थे। उसी दौरान, कृष्ण की उंगली पतंग की डोर से कट गई और खून बहने लगा। यह देखकर द्रौपदी घबरा गईं। उन्होंने तुरंत अपनी साड़ी का पल्लू फाड़कर कृष्ण की उंगली पर बांध दिया। उस छोटे-से कर्म में जो स्नेह और अपनापन छिपा था, वह कालांतर में एक अटूट बंधन बन गया।

श्रीकृष्ण ने बचाई थी द्रौपदी की लाज
कालांतर में जब कौरवों ने भरी सभा में द्रौपदी का अपमान करने की कोशिश की और दुशासन ने उनका चीरहरण करने का प्रयास किया, तब श्रीकृष्ण ने उसी प्रेम के ऋण को चुकाया। उन्होंने चमत्कारी रूप से द्रौपदी की लाज बचाई और उसकी साड़ी को अंतहीन कर दिया। इसीलिए यह पर्व सिर्फ भाई-बहन का नहीं, बल्कि समर्पण और रक्षा के उस वचन का प्रतीक है, जो दिल से निभाया जाता है। रक्षाबंधन का यह त्योहार श्रावण मास में मनाया जाता है, इसलिए इसे कई स्थानों पर श्रावणी, सावनी या सलूनो के नाम से भी जाना जाता है।

इंद्राणी के रक्षा सूत्र से जुड़ी है प्राचीन कथा
रक्षाबंधन की जड़ें धार्मिक और पौराणिक घटनाओं से जुड़ी हुई हैं। ऐसी ही एक कथा इंद्र और इंद्राणी की भी है, जिसका वर्णन भविष्य पुराण में मिलता है। कथा के अनुसार, जब देवता और असुरों के बीच घमासान युद्ध चल रहा था और देवराज इंद्र लगातार हार का सामना कर रहे थे, तब उनकी पत्नी इंद्राणी ने उनकी रक्षा के लिए एक उपाय किया। उन्होंने एक पवित्र सूत्र (धागा) मंत्रों के साथ तैयार किया और उसे इंद्र की कलाई पर बांध दिया। इस रक्षा सूत्र के प्रभाव से इंद्र में नया उत्साह, आत्मविश्वास और शक्ति का संचार हुआ। इसके बाद उन्होंने युद्ध में न केवल विजय प्राप्त की, बल्कि असुरों को पराजित कर देवताओं की रक्षा भी की। कहा जाता है कि यही घटना रक्षा सूत्र बांधने की परंपरा की शुरुआत बनी। समय के साथ यह परंपरा भाई-बहन के रिश्ते से जुड़ गई।

राजा बलि और माता लक्ष्मी की कथा
रक्षाबंधन का महत्व राजा बलि और देवी लक्ष्मी की कथा में भी मिलता है। जब भगवान विष्णु वामन अवतार में राजा बलि से तीन पग धरती मांगने आए, तो बलि ने अपना वचन निभाने के लिए स्वर्गलोक भी दे दिया। तब देवी लक्ष्मी ने ब्राह्मण वधू बनकर बलि को राखी बांधी और रक्षा का वचन लिया। इसके बदले में बलि ने वरदान मांगा कि भगवान विष्णु हमेशा उनके साथ रहें।

ऐतिहासिक महत्व: रानी कर्णावती और हुमायूं की कथा
रक्षाबंधन का पर्व सिर्फ पौराणिक मान्यताओं तक सीमित नहीं है, इसका इतिहास में भी एक भावुक और प्रेरणादायक प्रसंग मिलता है। यह कथा जुड़ी है चित्तौड़ की रानी कर्णावती और मुगल सम्राट हुमायूं से।

जब गुजरात के सुल्तान बहादुर शाह ने चित्तौड़ पर आक्रमण किया, तब रानी कर्णावती ने अपनी राज्य और प्रजा की रक्षा के लिए सम्राट हुमायूं को राखी भेजी थी। राखी को पाकर हुमायूं ने रानी की रक्षा का वचन लिया और तुरंत अपनी सेना लेकर निकल पड़े।

हालांकि हुमायूं समय पर चित्तौड़ नहीं पहुंच सके और रानी कर्णावती ने सम्मान की रक्षा के लिए जौहर कर लिया। लेकिन इसके बाद हुमायूं ने बहादुर शाह को पराजित किया और रानी के बेटे विक्रमादित्य को चित्तौड़ की गद्दी पर बिठाया।

यह घटना दर्शाती है कि रक्षाबंधन केवल भाई-बहन का पर्व नहीं, बल्कि सम्मान, विश्वास और जिम्मेदारी का प्रतीक भी है। रानी की राखी को सिर्फ एक धागा नहीं, बल्कि रक्षक का आह्वान माना गया, जिसे हुमायूं ने भले देर से, लेकिन पूरी निष्ठा से निभाया।

भारत के अलावा किन देशों में मनाया जाता है रक्षाबंधन?
रक्षाबंधन केवल भारत तक सीमित नहीं है, बल्कि यह पर्व अब अंतरराष्ट्रीय संस्कृति का हिस्सा बन चुका है। श्रीलंका, संयुक्त अरब अमीरात (UAE), मॉरीशस और नेपाल जैसे कई देशों में हिंदू समुदाय के साथ-साथ अन्य धर्मों के लोग भी इसे पूरी श्रद्धा और प्रेम से मनाते हैं। इस त्योहार ईसाई, मुस्लिम, सिख और बौद्ध समुदायों के लोग भी मनाते हैं। रक्षाबंधन अब सांस्कृतिक सीमाओं से परे एक मानवीय भाव बन चुका है।

अलग-अलग राज्यों में रक्षाबंधन की अलग-अलग मान्यताएं
उत्तर प्रदेश के गाजियाबाद के सुराना गांव में रक्षाबंधन नहीं मनाया जाता। मान्यता है कि सदियों पहले यहां एक भीषण नरसंहार हुआ था, जिसकी याद में आज भी यह दिन शोक के रूप में मनाया जाता है। राखी की जगह यहां के लोग भैया दूज पर भाई-बहन का त्योहार मनाकर उस रिश्ते की खुशी साझा करते हैं।

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