भूपेश बघेल को सुप्रीम कोर्ट से नहीं मिली राहत, याचिका खारिज की मांग ठुकराई, भतीजे विजय बघेल ने दी थी विधायकी को चुनौती
रायपुर। सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट के उस आदेश में दखल देने से इनकार कर दिया, जिसमें 2023 में पाटन विधानसभा सीट से छत्तीसगढ़ के पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल के चुनाव को चुनौती देने वाली याचिका को खारिज करने से मना कर दिया गया था. हालांकि, शीर्ष अदालत ने कहा कि बघेल को सुनवाई के दौरान हाई कोर्ट के चुनाव ट्रिब्यूनल के सामने अपनी सभी दलीलें रखने की आज़ादी होगी.
SC का छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट के आदेश में दखल देने से इनकार
भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्य बागची और वी. मोहना की बेंच ने बघेल की उस याचिका का निपटारा किया, जिसमें हाई कोर्ट के 15 जून के अंतरिम आदेश को चुनौती दी गई थी. इस आदेश में ‘कॉज़ ऑफ़ एक्शन’ (मुकदमे का आधार) न होने और कानूनी ज़रूरतों का पालन न करने के आधार पर चुनाव याचिका को खारिज करने की उनकी अर्ज़ी को नामंज़ूर कर दिया गया था. अदालत ने कहा कि बघेल के पास तर्कपूर्ण बचाव का आधार है और यह स्पष्ट किया कि उनकी चुनौती को खारिज करने से कार्यवाही के दौरान चुनाव ट्रिब्यूनल के सामने सभी बिंदु और तर्क रखने के उनके अधिकार पर कोई असर नहीं पड़ेगा.
वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल ने दिया तर्क
पूर्व सीएम भूपेश बघेल की ओर से पेश वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल ने तर्क दिया कि चुनाव याचिका कानून के तहत सुनवाई योग्य नहीं थी. आरोपों का ज़िक्र करते हुए, वकील सुमीर सोढ़ी के साथ पेश हुए सिब्बल ने कहा कि चुनाव प्रचार 15 नवंबर को खत्म हो गया था और बघेल कथित तौर पर 16 नवंबर को एक धार्मिक कार्यक्रम में मौजूद थे. याचिकाकर्ता का दावा था कि इससे ‘रिप्रेज़ेंटेशन ऑफ़ द पीपल एक्ट’ (RPA) की धारा 126 का उल्लंघन हुआ है. सिब्बल ने कहा कि अगर आरोपों को मान भी लिया जाए, तो धारा 126 का उल्लंघन केवल एक चुनावी अपराध है, न कि एक्ट की धारा 123(7) के तहत “भ्रष्ट आचरण” (corrupt practice). उन्होंने कहा, “सवाल यह है कि क्या यह भ्रष्ट आचरण के दायरे में आता है. भ्रष्ट आचरण से संबंधित प्रावधान धारा 123(7) में दिए गए हैं.”
“साइलेंस पीरियड” में आदर्श आचार संहिता के उल्लंघन का मामला
आरोप लगाया गया था कि “साइलेंस पीरियड” (चुनाव प्रचार बंद होने की अवधि) शुरू होने के बाद, बघेल ने RP एक्ट की धारा 126 और आदर्श आचार संहिता का स्पष्ट उल्लंघन करते हुए एक “रैली/रोड शो” किया था. सुनवाई के दौरान, जस्टिस बागची ने कहा कि विचार करने वाला मुद्दा यह है कि क्या कथित उल्लंघन ने “चुनाव के नतीजों पर कोई बड़ा असर डाला है.” सिब्बल ने कहा कि यह सवाल तथ्यों पर आधारित था और वैसे भी, प्रतिवादी का अपना कहना था कि सभा में केवल 200 लोग ही शामिल हुए थे. उन्होंने कहा कि बघेल लगभग 20,000 वोटों के अंतर से चुनाव जीते थे, इसलिए यह दावा करना मुश्किल है कि कथित बैठक ने चुनाव के नतीजों पर कोई खास असर डाला.
दायर याचिका में आरोपों से किया था इंकार
बघेल ने वकील सोधी के ज़रिए दायर अपनी याचिका में इस आरोप से इनकार किया कि उन्होंने RPA की धारा 126 के तहत 48 घंटे की चुनाव प्रचार-मुक्त अवधि का उल्लंघन किया था. याचिका में कहा गया है कि हाई कोर्ट ने चुनाव याचिका को खारिज करने से इनकार करके गलती की, साथ ही यह भी कहा गया कि चुनाव याचिका में ज़रूरी तथ्यों की कमी थी, इसमें अस्पष्ट और अटकलों पर आधारित बातें थीं और इसे RPA की धारा 83 के तहत ज़रूरी हलफनामे का समर्थन भी हासिल नहीं था.
