May 14, 2026

बिलासपुर हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: शिक्षाकर्मियों को नहीं मिलेगा समान वेतनमान, अपील खारिज

CG HIGHCOURT

बिलासपुर। छत्तीसगढ़ की बिलासपुर हाईकोर्ट ने शिक्षाकर्मियों की समान वेतनमान से जुड़ी मांग पर बड़ा फैसला सुनाया है। कोर्ट ने शिक्षाकर्मियों की अपील खारिज करते हुए स्पष्ट कहा कि उन्हें नियमित शिक्षकों के बराबर वेतन और सुविधाएं नहीं दी जा सकतीं।

इस फैसले को शिक्षाकर्मियों के लिए बड़ा झटका माना जा रहा है। लंबे समय से पंचायत संवर्ग के शिक्षाकर्मी समान काम के आधार पर नियमित शिक्षकों जैसी वेतन और सुविधाओं की मांग कर रहे थे। मामले की सुनवाई के दौरान कोर्ट ने दोनों सेवाओं की संरचना और नियुक्ति प्रक्रिया का विस्तार से परीक्षण किया। फैसले के बाद प्रदेशभर में शिक्षाकर्मियों के बीच चर्चा तेज हो गई है।

पंचायत संवर्ग और शिक्षा विभाग को बताया अलग
हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि पंचायत विभाग के शिक्षाकर्मी और शिक्षा विभाग के नियमित शिक्षक दो अलग संवर्ग हैं। कोर्ट के अनुसार दोनों की नियुक्ति प्रक्रिया, सेवा शर्तें और प्रशासनिक ढांचा अलग-अलग है। इसी आधार पर अदालत ने माना कि दोनों को समान श्रेणी में नहीं रखा जा सकता।

कोर्ट ने कहा कि पंचायत विभाग के अंतर्गत नियुक्त शिक्षाकर्मी नियमित शिक्षा विभाग के कर्मचारियों के बराबर नहीं माने जाएंगे। फैसले में यह भी स्पष्ट किया गया कि केवल कार्य की प्रकृति समान होने से वेतन और सेवा लाभ स्वतः समान नहीं हो जाते। इस टिप्पणी के बाद शिक्षाकर्मियों की “समान काम समान वेतन” की दलील कमजोर पड़ गई।

“समान काम-समान वेतन” की दलील नहीं मानी
मामले की सुनवाई के दौरान शिक्षाकर्मियों की ओर से “समान काम-समान वेतन” का सिद्धांत लागू करने की मांग की गई थी। हालांकि हाईकोर्ट ने इस तर्क को स्वीकार नहीं किया। अदालत ने कहा कि समान वेतन का दावा तभी मान्य हो सकता है जब नियुक्ति प्रक्रिया, जिम्मेदारियां, सेवा शर्तें और संवर्ग पूरी तरह समान हों।

कोर्ट ने पाया कि पंचायत संवर्ग के शिक्षाकर्मियों और नियमित शिक्षकों के बीच कई प्रशासनिक और कानूनी अंतर मौजूद हैं। इसी कारण अदालत ने शिक्षाकर्मियों को नियमित शिक्षकों के समान वेतनमान देने से इनकार कर दिया। फैसले के बाद शिक्षाकर्मी संगठनों में निराशा का माहौल देखा जा रहा है।

प्रमोशनल वेतनमान पर भी साफ टिप्पणी
हाईकोर्ट ने प्रमोशनल वेतनमान की मांग पर भी स्पष्ट रुख अपनाया। अदालत ने कहा कि पंचायत संवर्ग की सेवा को नियमित शिक्षक संवर्ग के बराबर नहीं माना जा सकता, इसलिए प्रमोशनल वेतनमान का लाभ भी उसी आधार पर नहीं दिया जा सकता।

कोर्ट ने माना कि दोनों सेवाओं के नियम और ढांचे अलग हैं, इसलिए समान लाभ देने का दावा उचित नहीं है। इस फैसले से शिक्षाकर्मियों की वे सभी मांगें प्रभावित हुई हैं जो नियमित शिक्षकों के बराबर सुविधाएं देने से जुड़ी थीं। कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि यह फैसला भविष्य में ऐसे मामलों के लिए भी महत्वपूर्ण माना जाएगा।

फैसले के बाद बढ़ी राजनीतिक और कर्मचारी हलचल
हाईकोर्ट के इस फैसले के बाद प्रदेश में शिक्षाकर्मी संगठनों और कर्मचारी संघों के बीच हलचल बढ़ गई है। कई संगठनों ने फैसले पर निराशा जताई है और आगे की कानूनी रणनीति पर विचार करने की बात कही है। वहीं सरकार और प्रशासनिक हलकों में इस फैसले को महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

शिक्षाकर्मियों का कहना है कि वे लंबे समय से नियमित शिक्षकों के समान अधिकार और वेतन की मांग कर रहे हैं। दूसरी ओर कानूनी जानकारों का मानना है कि अदालत ने सेवा संरचना और नियुक्ति प्रक्रिया को आधार बनाकर फैसला दिया है। फिलहाल शिक्षाकर्मी समान वेतनमान का यह मामला प्रदेशभर में चर्चा का विषय बना हुआ है।

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