CG : जींस वाले गुरूजी को जेडी ने चैंबर से भगाया! कहा, ‘मेरे ऑफिस में जींस पैंट नहीं चलता’, शिक्षक समुदाय नाराज, कहा – ऐसी तानाशाही बर्दाश्त नहीं…
जगदलपुर। छत्तीसगढ़ के स्कूल शिक्षा विभाग में एक से बढ़कर एक वाक्या सामने आ रहे हैं। जगदलपुर स्थित संयुक्त संचालक (शिक्षा) कार्यालय में बीते दिनों एक बेहद दुर्भाग्यपूर्ण और निंदनीय घटना घटी, जिसने न केवल शिक्षकों की गरिमा को आहत किया, बल्कि एक अफसर की संकीर्ण मानसिकता और तानाशाही सोच को भी उजागर कर दिया। माध्यमिक शाला मचली के शिक्षक प्रकाश नेताम जब अपने स्पष्टीकरण देने संयुक्त संचालक कार्यालय पहुँचे, तो वे शालीन सफेद शर्ट और काले जींस पैंट में थे।
साफ-सुथरे, साधारण और मर्यादित पहनावे में शिक्षक की नीयत स्पष्ट थी – कार्य के प्रति सजगता। लेकिन अफसोस, अफसर की दृष्टि काम से ज़्यादा कपड़ों पर थी। संयुक्त संचालक, जिन्हें शिक्षक का स्पष्टीकरण सुनना था, उन्होंने शिक्षक के पहनावे पर आपत्ति जताते हुए उन्हें यह कहते हुए कार्यालय से बाहर निकाल दिया कि “मेरे ऑफिस में जींस पैंट नहीं चलता।” क्या अब सरकारी कार्यालयों में योग्यता से ज़्यादा यूनिफॉर्म की जांच होगी?
यहाँ प्रश्न यह नहीं कि जींस पैंट सही है या गलत, बल्कि यह है कि क्या किसी शिक्षक को सिर्फ पहनावे के आधार पर अपमानित कर देना उचित है? क्या एक अधिकारी अपने निजी मत को आधिकारिक आदेश मानकर दूसरों पर थोप सकता है?
प्रदेश अध्यक्ष, विकास सिंह राजपूत (नवीन शिक्षक संघ, छ.ग.) ने तीखी प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि “यदि कोई शिक्षक कटी-फटी, अशोभनीय फैशन वाली जींस पहनता तो बात समझ आती, लेकिन एक सामान्य और गरिमामयी पहनावे के लिए उसे कार्यालय से अपमानित करना शिक्षा व्यवस्था की आत्मा पर हमला है। बड़े-बड़े IAS, IPS अफसर भी जींस पहनते हैं – क्या अब उनकी योग्यता पर भी प्रश्नचिन्ह लगेगा?“
सहायक शिक्षक समग्र शिक्षक फेडरेशन के प्रांतीय अध्यक्ष मनीष मिश्रा ने कहा कि “यह कृत्य न केवल निंदनीय है बल्कि शिक्षकों की गरिमा पर सीधा प्रहार है। शिक्षक ने पूरी शालीनता के साथ सामान्य कपड़े पहने थे। शिक्षा विभाग में कोई निर्धारित ड्रेस कोड नहीं है, ऐसे में किसी अधिकारी द्वारा अपनी निजी सोच को नियम बनाकर थोपना तानाशाही से कम नहीं।”
उन्होंने कहा कि यदि कोई शिक्षक फटी-पुरानी या अशोभनीय फैशन वाली जींस पहनता तो बात समझ में आती, लेकिन एक सादे और मर्यादित पहनावे में आए शिक्षक का इस तरह अपमान करना शिक्षा व्यवस्था की आत्मा को ठेस पहुँचाने जैसा है। मिश्रा ने मांग की कि सरकार को इस पूरे मामले की जांच कर अधिकारी के खिलाफ सख्त कार्रवाई करनी चाहिए।
जो शिक्षक बच्चों को अनुशासन, नैतिकता और मर्यादा सिखाते हैं, उन्हीं के साथ ऐसा व्यवहार करना पूरे समाज के लिए एक शर्मनाक संदेश देता है। अफसरों की यह कार्यशैली एक नई बहस को जन्म देती है – क्या सरकारी दफ्तरों में अब ड्रेस कोड से ही तय होगा सम्मान और अपमान?सरकार को इस मामले में न केवल सजग होना चाहिए, बल्कि यह सुनिश्चित करना चाहिए कि ऐसे तानाशाही रवैये पर लगाम लगे। शिक्षक का अपमान, समाज के ज्ञान और संस्कार का अपमान है।
शिक्षक समुदाय का कहना है कि यह अनुशासन नहीं बल्कि तानाशाही है। जो शिक्षक समाज को मर्यादा, शालीनता और संस्कार सिखाते हैं, उनके साथ इस तरह का व्यवहार पूरे समाज के लिए गलत संदेश देता है।अब यह मामला धीरे-धीरे राज्यभर में चर्चा का विषय बन गया है। शिक्षक संगठन इसे “शिक्षक सम्मान बनाम अफसरशाही” की लड़ाई मान रहे हैं और चेतावनी दी है कि यदि आरोपी अधिकारी पर कार्रवाई नहीं की गई, तो आंदोलन किया जाएगा।
