January 29, 2026

अंतर्राष्ट्रीय पटल पर बस्तर का तिरिया गांव, आदिवासियों की जिद ने बदली तस्वीर, नक्सलगढ़ बना टूरिस्टगढ़

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बस्तर। घने जंगलों और आदिवासी बहुल इलाके के गांव अब दुनियाभर में छा रहे हैं. छत्तीसगढ़ और ओडिशा के बॉर्डर एरिया पर बसा गांव तिरिया विश्वस्तर पर अपनी पहचान बना रहा है. परस्पर सहयोग और ग्राम को बेहतर बनाने की कोशिश ने तिरिया गांव की तकदीर बदल दी है. तिरिया गांव के ग्रामीण आपस में मिलकर गांव की न सिर्फ सफाई सफाई और जंगल का ध्यान रखते हैं बल्कि जंगल को बढ़ाने का भी काम कर रहे हैं. प्रकृति की गोद में बसे तिरिया गांव को पर्यटन के नक्शे पर लाने के लिए गांव वाले लगातार कोशिश कर रहे हैं.

विश्व स्तर पर अपनी पहचान बनाता तिरिया: हाल ही में तिरिया गांव को आरआरआई जैसी मानक संस्था के सम्मान से सम्मानित किया जा चुका है. इस सम्मान को पाने के बाद तिरिया गांव बस्तर के एक आदर्श गांव के रुप में लोगों के सामने आया है. जगदलपुर जिला मुख्यालय से 30 किमी की दूरी पर तिरिया गांव है. ये पूरा इलाका माचकोट वन परिक्षेत्र के भीतर आता है. तिरिया गांव की कुल आबादी वर्तमान में 420 है. गांव के लोग बताते हैं कि उन लोगों ने साल 2020 में वन अधिकार कानून के तहत दावा पेश किया था. तिरिया गांव की ओर से किए गए दावे के बाद उनको वन अधिकार कानून के तहत 3057.76 हेक्टेयर भूमि पर अधिकार पत्रक सौंपा गया. अधिकार पत्र मिलने के बाद तिरिया गांव के लोगों को वनों की सुरक्षा के साथ गांव की सुरक्षा की व्यस्था सौंपी गई. अधिकार पत्र मिलने के बाद तेजी से गांव की तस्वीर बदलने लगी.

गांव को बना रहे ईको फ्रेंडली: वन प्रबंधन समिति ने बताया कि वन प्रबंधन के साथ ही गांव के लोगों के लिए रोजगार की भी जरुरत है. इस समस्या को देखते हुए तिरिया संगम को पर्यटन के लिए विकसित करना शुरू किया गया. साल 2023 से तिरिया में पर्यटन शुरू करके कार्य शुरू किया गया. तिरया में गणेश बहार और शबरी नदी का संगम है. जलप्रपात से निकली धारा गणेश बहार नदी में मिलती है फिर आगे जाकर शबरी नदी से इसके जल का संगम होता है.

गणेश बहार और शबरी नदी का संगम स्थल: जहां पर दोनों नदियों का जल आपस में मिलता है वहां का नजारा काफी सुंदर है. हर साल बड़ी संख्या में पर्यटक सर्दियों के मौसम में संगम देखने आते हैं. गांव वाले बताते हैं कि पहले ये पूरा इलाक गंदगी और कचरे से भरा पड़ा था. गांव वालों ने मिलकर इस कचरे का निपटारा किया. ईको फ्रेंडली कचरे के बास्केट में कचरा जमा कर अब ये लोग उसका सावधानी पूर्वक निपटारा करते हैं.

पानी में तैरने वाली चटाई: पर्यटकों को नदी में घुमाने और संगम दिखाने के लिए गांव वाले एक खास चटाई भी बनाते हैं. बांस और लकड़ी से बने इस चटाई पर चढ़कर बड़े आराम से नदी को पार किया जाता है. गांव वाले तिरिया ग्राम को टूरिस्ट प्लेस के रुप में डेवलप कर उससे अपनी आमदनी भी बढ़ा रहे हैं. गांव के लोग बीच बीच में श्रमदान कर इलाके की साफ सफाई भी करते हैं. इस काम में गांव की महिलाएं और बच्चे भी शामिल होते हैं.

बम्बू राफ्टिंग: गणेश बहार शबरी नदी देखने आने वालों को गांव के ये लोग बांस से बनी बम्बू राफ्टिंग भी कराते हैं. गांव वाले बताते हैं कि बम्बू राफ्टिंग के लिए ये पर्यटकों से 100 रुपए लेते हैं. तिरिया का बम्बू राफ्टिंग अब तेजी से फेमस होता जा रहा है. गांव वाले बताते हैं कि छत्तीसगढ़ के अलावा कई और राज्यों से भी लोग यहां आते हैं. गांव वाले कहते हैं कि हम यहां घूमने आए मेहमानों को परिवार जैसा सम्मान देते हैं. गांव के लोग मछली पालन के जरिए अपनी आय बढ़ाने का भी काम कर रहे हैं.

जंगल बचाने के लिए गश्त: गांव के लोग ही वन प्रबंधन का काम भी देखते हैं. जंगल की लकड़ी नहीं काटी जाए इस बात का भी ख्याल रखते हैं. गांव वाले बताते हैं कि ओडिशा सीमा से लगे गांव वाले जंगल में अवैध तरीके से प्रवेश करते हैं. जंगल में आकर चोरी छिपे लकड़ी काट ले जाते हैं. वन प्रबंधन का काम देखने वाले गांव के लोग जंगल की रक्षा के लिए पहरा भी देते हैं. जैसे ही उनको जंगल काटे जाने की खबर मिलती है वो दिन हो या रात मौके पर पहुंच जाते हैं.

जंगल को आग से बचाया: गांव वाले बताते हैं कि पहले जंगल में गर्मी के दिनों में कई बार आग लगने की घटना हो जाती थी. लेकिन अब ग्रामीणों की सजगता से आग लगने की एक भी घटना नहीं होती. पूरा जंगल गर्मियों में सुरक्षित रहता है.

वनों पर अतिक्रमण भी रुका: तिरिया गांव के लोग बताते हैं कि पहले जंगल की जमीन पर अतिक्रमण होना आम बात थी. उन लोगों ने जब से वन प्रबंधन का काम अपने हाथ में लिया. वनों पर अतिक्रमण का काम रुक गया. गांव के लोग अब जंगल को घना बनाने के लिए ऑक्सीजन देने वाले प्लांट भी लगा रहे हैं.

इलाके को सुंदर बनाने की कोशिश: पर्यटकों को लुभाने के लिए तिरिया गांव के लोग लगातार साफ सफाई का अभियान चलाते रहते हैं. बच्चों से भी कहा जाता है कि वो प्लास्टिक के सामान का इस्तेमाल कम से कम करें. प्लास्टिक के बोतलों को यहां वहां नहीं फेंके. इस तरह के कचरे को एक जगह जमा कर कबाड़ में दे दें.

प्रबंधन समिति करती है बैठकें: गांव के लोगों ने गांव के विकास और पर्यटन के काम को बढ़ाने के लिए कोर टीम भी बना रखी है. गांव की ये कोर टीम हर महीने ग्राम सभा की बैठक आयोजित करती है. बैठक में गांव के सभी लोग शामिल होते हैं. बैठक रात के वक्त रखी जाती है ताकि महिलाएं भी इसमें शामिल हो सकें.

जून से सितंबर तक पर्यटन पर रहती है रोक: गांव के लोग कहते हैं कि जून के पहले हफ्ते से बारिश शुरु हो जाती है. नदी के ढलानों पर बारिश की वजह से फिसलन और पानी बढ़ जाता है. तेज धारा में पर्यटकों को ले जाना खतरे से खाली नहीं होता. पर्यटकों का ध्यान रखते हुए हम लोगों ने तय किया कि जून से सितंबर तक पर्यटन को बंद रखेंगे. नदी में लेकर किसी को नहीं जाएंगे. जब पर्यटन बंद होता है तब हम इलाके की साफ सफाई और सुंदरता बढ़ाने पर काम करते हैं.

RRI यानि राइट्स एंड रिसोर्सेज इनिशिएटिव: तिरिया ग्राम के प्रबंधन कार्य को देखने और इस पर अध्ययन करने के लिए भारतदेश के अलग अलग राज्यों के लोग यहां पहुंचते हैं. बाहर से आए लोग यहां के लोगों के साथ जुड़कर उनसे गांव के विकास और वन प्रबंधन का काम सीखते हैं. तिरिया गांव के लोग अपने अनुभव और कामों के आधार पर उनको प्रशिक्षण भी देते हैं. बस्तर के लिए ये एक बड़ी उपलब्धि से कम नहीं है.

तिरिया को मिला सम्मान: तिरिया ग्राम में हुए कामों को देखते हुए RRI ने ग्राम को विकसित प्रबंधन गांव के रूप में सम्मानित किया है. ग्रामीणों ने कहा कि ऐसे ही पूरे बस्तर संभाग के गांवों को अधिकार पत्रक के लिए आगे आना चाहिए. अपने गांव, जल, जंगल और जंगल को सुरक्षित रखना चाहिए. ताकि जंगल बचाया जा सके. क्योंकि जंगल रहने से बस्तर में आम आदमी स्वस्थ रूप से जीवन जी सकेगा.

जनजातियों की मिलती है झलक: तिरिया ग्राम में रहने वाले धुरवा जनजाति के लोग पर्यटन स्थल में अपनी संस्कृति की भी झलक दिखाते हैं. पर्यटकों के सामने धुरवा जनजाति के लोग एक सुर में अपनी पारंपरिक लोक गीत गाते हैं. अपने पारंपरिक नाच गाने से लोगों को खूब मनोरंजन करते हैं. पर्यटक इनके रंग में इतने रंग जाते हैं कि वो भी इनके साथ झूमने को मजबूर हो जाते हैं.

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