CG : किसानों के लिए वरदान बना देसी करहनी धान, औषधीय गुण के साथ देता है ज्यादा मुनाफा
कोरिया। छत्तीसगढ़ के कोरिया जिले में बदलते मौसम, गिरते जलस्तर और खेती की बढ़ती लागत के बीच पारंपरिक धान की खेती किसानों के लिए घाटे का सौदा बनते जा रही है. इन सबके बीच कोरिया जिले का देसी करहनी धान अब किसानों के लिए उम्मीद की किरण बनकर उभरा है. ये धान सिर्फ फसल नहीं बल्कि किसानों की आर्थिक मजबूती और लोगों के बेहतर स्वास्थ्य का आधार बनते जा रहा है.
कम समय में तैयार होता है धान
कम समय में तैयार होने वाला, कम पानी में अच्छी उपज देने वाला और औषधीय गुणों से भरपूर यह धान अब जिले के किसानों के बीच तेजी से लोकप्रिय हो रहा है. यही वजह है कि इसकी खेती का रकबा लगातार बढ़ रहा है और किसान इससे बेहतर मुनाफा भी कमा रहे हैं.
पीढ़ियों से जुड़ी परंपरा, अब बन रही पहचान
कोरिया जिले के किसान लक्ष्मी नारायण राजवाड़े बताते हैं कि करहनी धान की खेती उनके परिवार में पीढ़ियों से होती आ रही है. उनके पिताजी और पूर्वज करीब कई सालों से इसकी खेती करते आ रहे हैं.

मैं खुद पिछले 10-12 सालों से करहनी धान उगा रहा हूं. वर्तमान में करीब 5 एकड़ भूमि में करहनी धान की खेती कर रहा हूं, जिससे सालाना 3 लाख रुपए से अधिक की आमदनी हो रही है. इस फसल में लागत कम और मुनाफा ज्यादा है, क्योंकि इसमें पानी की जरूरत बहुत कम होती है और बीमारियां भी लगभग नहीं लगतीं- लक्ष्मी नारायण राजवाड़े, किसान
कम समय में तैयार, ज्यादा लचीलापन
जहां सामान्य धान को तैयार होने में 100 से 120 दिन लगते हैं, वहीं करहनी धान महज 90 से 100 दिनों में ही पककर तैयार हो जाता है. इतना ही नहीं, इसे देरी से बोने पर भी अच्छी उपज मिल जाती है, जो किसानों के लिए एक बड़ा फायदा है.खासतौर पर उन इलाकों में जहां मानसून अनिश्चित रहता है.
स्वास्थ्य के लिए भी फायदेमंद
इस धान की सबसे खास बात इसके औषधीय गुण हैं. किसान लक्ष्मी नारायण की पत्नी सुमित्रा राजवाड़े बताती हैं कि जो लोग इस चावल को खाते हैं, वे खुद आकर बताते हैं कि इससे शुगर और बीपी जैसी समस्याओं में राहत मिलती है.विशेषज्ञ भी इसकी पुष्टि करते हैं.

करहनी धान में ऐसे पोषक तत्व पाए जाते हैं जो शरीर के लिए बेहद लाभकारी हैं. इसमें आयरन की कमी दूर करने, लकवा और शुगर जैसी बीमारियों में सहायक तत्व मौजूद होते हैं- कमलेश कुमार सिंह,वरिष्ठ वैज्ञानिक, कृषि विज्ञान केंद्र
जीआई टैग की ओर बढ़ते कदम
करहनी धान को राष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाने के लिए जिला प्रशासन और इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय के सहयोग से इसे जीआई टैग के लिए पंजीकरण की प्रक्रिया शुरू की गई है. यदि ये टैग मिल जाता है, तो न सिर्फ इस धान की ब्रांड वैल्यू बढ़ेगी, बल्कि किसानों को बेहतर बाजार और उचित कीमत भी मिल सकेगी.
खेती का नया मॉडल
करहनी धान अब सिर्फ एक पारंपरिक फसल नहीं रहा, बल्कि यह बदलते समय में टिकाऊ खेती का एक मजबूत मॉडल बनकर सामने आ रहा है. यह न केवल किसानों की आय बढ़ाने में मददगार है, बल्कि लोगों को बेहतर और पौष्टिक भोजन भी उपलब्ध करा रहा है. कोरिया जिले का ये देसी धान अब धीरे-धीरे राष्ट्रीय पहचान की ओर बढ़ रहा है. यदि यही रफ्तार बनी रही, तो आने वाले समय में “करहनी धान” देशभर के किसानों के लिए प्रेरणा बन सकता है.
